सादर अभिवादन !
राय बहादुर अपनी जिम्मेदारी समझते हुए कुछ अनुरोध करना चाहता है….
कुछ कार्य व निर्णय अविलंब लिए जाएं….
जैसे भी हो सके टेस्टिंग को बढ़ाया जाए। किसी भी महामारी से हम तब तक नहीं लड़ सकते जब तक हमारे पास उस महामारी से जुड़े हुए सही आंकड़े न हों।
भारत को सही से टेस्टिंग की दर को बढ़ाना चाहिए।
देश मे एक भी रीति नीति ऐसी नही है कि एक अच्छे मानक का ISO सर्टिफाइड ऑक्सीमीटर मिल जाए, पता नहीं कैसे कैसे ऑक्सीमीटर बाजार में आ गए हैं, जो सही से चलना तो दूर माप को लेकर भी संशय खड़ा कर रहे हैं। विशुद्ध मानक वाला Dr Trust USA का जो ऑक्सीमीटर 1700 तक आता था वो 3 से 4 हज़ार में भी नही मिल रहा है। डॉक्टर मोरपेन, accu-sure, Microtech, BPL आदि के भी नदारद है। इसकी बेहद किल्लत है….जबकि बीमारी में सही से जानकारी के लिए ये पहला अस्त्र है…
जेम पोर्टल अथवा किसी भी ऐसी जगह पर सभी ऑक्सीमीटर की उपलब्धता, मूल्य , प्रमाणन के साथ उपलब्ध होना चाहिए। देश के प्रत्येक जनपद में 10 हज़ार ऑक्सीमीटर की उपलब्धता जरूर हो जिसे उचित दरों पर लोग खरीद सकें।
इसी तरह से हर गांव में 10 , ऑक्सीमीटर, 10 इंफ्रारेड थरमामीटर की उपलब्धता ग्राम समाज, आशा बहुओं , PHC, CHC, ग्राम पंचायतों में पंचायती राज के बजट से कर दी जाए।
भाप लेने के लिए Vaporiser, Nebulizer इनके भी उत्पादन, मूल्य नियंत्रण व क्वालिटी कंट्रोल पर ध्यान देकर उपलब्धता बढ़ाये जाने की आवश्यकता है।
इन सभी जगहों पर रेडक्रोस सोसायटी , NCC, स्काउट आदि के माध्यम से बचाव से लेकर लक्षणों को पहचानकर आइसोलेशन, इलाज की तुरंत वाली व्यवस्था सुनिश्चित किये जाने की आवश्यकता है।
यही वो जगह है जहाँ से हम L1, L 2 और L 3 की चिकित्सा सहायता के मरीजों का चिन्हीकरण कर सकते हैं।
सभी कस्तूरबा आवासीय विद्यालयों, केंद्रीय विद्यालयों, इंजीनियरिंग कॉलेजों , इंटर, डिग्री कालेजों को L 1
L 2 सुविधाओं के अस्पताल में उनके छात्रावासों, मेस के इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ उपयोग में लाया जा सकता है !
इन सब सुविधाओं, व्यवस्थाओं का उपयोग वैक्सीन लगवाने में सहायता लेने के रूप में हो सकता है।
मनोबल को बढ़ाने, उन्हें बनाये रखने में भी ये उपयोगी साबित हो सकते हैं।
ऐसा प्रायः देखा जा रहा है कि ऑक्सिजन की सप्लाई के केंद्रों और जहाँ मरीजों की तादाद है वहाँ तक लॉजिस्टिक को लेकर ढुलाई के खर्चे व समय दोनों का नुकसान हो रहा है। क्या ऐसा हो सकता है कि हम उन्ही ऑक्सीजन केंद्रों के निकट ही DRDO, सेना व अन्य पैरामिलिट्री फोर्सेज द्वारा शीघ्रता से बनाये जाने वाले हॉस्पिटल्स का निर्माण करें ?
मरीजों को लाया जाना या मरीजों के बेहद निकट के संकुल और ऑक्सीजन प्लांट की निकटता आदि को लेकर भी कुछ भावी नीति बनाई जा सकती है।
कई महत्वपूर्ण , सस्ती व इस इलाज के लिए कारगर दवाएं मार्केट से गायब हो रही है!
पैरासिटामॉल
विटामिन C, D 3
जिंक, मल्टीविटामिन
Doxy, Ivermectin
सरीखे दवाएं, Dexamethasone, अन्य जरूरी steroids इन सबकी मार्केट में उपलब्धता व उत्पादन बढ़ाये जाने की जरूरत है।
ऑक्सीजन के सिलेंडर, उनका रेगुलेटर, मास्क, कैनुला आदि भी उपलब्ध होने चाहिए।
ऑटो रिक्शा, टैक्सी, अन्य सार्वजनिक परिवहन के साधनों को अस्थाई एम्बुलेंस में बदले जाने की विधि व ट्रेनिंग ऑनलाइन, वीडियो व जनपद स्तर पर भी ट्रेनिंग दिए जाने की जरूरत है।
एम्बु बैग जो कि 200/300 की चीज है आज किसी एम्बुलेंस या दुकान पर नही मिल रहा है। जबकि 2 घंटे के क्रिटिकल समय मे इससे भी जान बचाकर समय से अस्पताल पहुंचाया जा सकता ( लोग अपने परिजनों को अपने मुंह से सांस देते हुए पाए जा रहे हैं) है।
सभी राज्यो के सभी स्वास्थ्य व आपदा के संसाधनों का जनपदवार डेटा ऑनलाइन उपलब्ध होना चाहिए।
इसमे ग्राम से लेकर हर स्तर की उपलब्धता व कमी का ब्यौरा दर्ज हो… इसे नेशनल हेल्थ एंड डिजास्टर मैनेजमेंट ग्रिड ( National Health And Disaster Management Grid) बनाकर जोड़ा जाना चाहिए। बिना इस तरह के प्रयास व एक्चुअल डेटा , टेस्ट, साफ सुथरे एजेंडे के हम इस महामारी के प्रचलित सेकंड वेव या आगामी थर्ड वेव किसी का भी सही से मुकाबला नही कर सकते।
उदाहरण केवल इतना है कि BJP में हर बूथ तक का नेटवर्क है। केवल अपने अपने बूथ के बूथ अध्यक्ष से ही ये पूछ लिया जाए कि कुल कितने बीमार है तो वो बोलेगा की हर गांव के 80 % घरों में लोग बीमार हैं। एक्टिव केस सोचिए कि कितने होंगे ?
उत्तर प्रदेश के एक लाख गांवों में से हर तीसरे गांव में एक मौत अप्रैल माह के हर दिन औसत रूप से हुई है…. ये आंकड़ा अपने कार्यकर्ताओं, ग्राम समाज के कर्मचारियों और सभी जनमानस के सामान्य चर्चाओं का है।
नही तो उत्तर प्रदेश जैसे 23 करोड़ से अधिक की आबादी वाले राज्य में 200 मौत प्रतिदिन होने से अंत्येष्टि संस्कार के लिए शमशानों में इमरजेंसी नही आ जाती या टोकन नहीं बांटना पड़ता !
हम बीमारी को लेकर जितने ही सजग, सहज व पारदर्शी होंगे, जितने ही अधिक सही आंकड़ों से लैस होंगे उतना ही आसान इस बीमारी के खिलाफ लड़ना रहेगा।
ये एकदम सत्यता के करीब का सर्वे समझिए कि बीमारों , बीमारी, ईलाज , ऐक्टिव केसों की सही संख्या, सही मृत्यु की जानकारी आदि को पारदर्शी तरीके से न प्रस्तुत करना सरकार के विरुद्ध अपने आप ही हो जाता है ! ऐसा हो भी रहा है।
अब तक कि अपनी तमाम अच्छी कोशिशों, वैक्सीन के सफल उत्पादन व विगत 7 वर्षों की अपनी सारी उपलब्धियों पर ये लापरवाही पानी फेर रही है।
अभी भी समय है , सब कुछ सहेजा व बचाया जा सकता है !
सादर !
रायबहादुर की ओर से….
बृजकिशोर दूबे
राष्ट्रीय संयोजक
श्रद्धालु महासभा
